Prana Vidya, Science & Healing
Based on Ancient Traditions & Modern Science
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इस पुस्तक में दी गई जानकारी ऐतिहासिक शोध और प्राचीन परंपराओं (भारतीय और जावानीस) पर आधारित है। 'प्राण विद्या' और 'मैगनेटिज्म' का अभ्यास शक्तिशाली हो सकता है। इसे किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। यह पाठ्यक्रम केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए है।
इस सामग्री का पुनरुत्पादन (Reproduction) या वितरण बिना लिखित अनुमति के सख्त मना है। यह ज्ञान पवित्र है और इसे सम्मान के साथ संभाला जाना चाहिए।
प्राचीन परंपराओं में, जिसे आज हम "Animal Magnetism" या "Mesmerism" कहते हैं, उसे हजारों साल पहले भारत और जावा में "प्राण विद्या" (Prana Vidya) या "गेंडम" (Gendam) के नाम से जाना जाता था। यह केवल सम्मोहन (Hypnosis) नहीं है। सम्मोहन मन के सुझावों पर काम करता है, जबकि मैगनेटिज्म "प्राण ऊर्जा" (Vital Life Force) के सीधे संचरण (Transmission) पर काम करता है।
जावानीस संस्कृति पर भारतीय (हिंदू-बौद्ध) परंपरा का गहरा प्रभाव रहा है। मजापहित (Majapahit) साम्राज्य के दौरान, ऋषियों और योगियों ने जावा में "तपस्या" और "मंत्र विज्ञान" का प्रसार किया।
जावानीस 'लाकू' (Laku) और भारतीय 'तपस्या' (Tapasya) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का उद्देश्य शरीर की अशुद्धियों को जलाकर आंतरिक चुंबकत्व (Inner Magnetism) को जगाना है। R.T. Puspanagara की शिक्षाएं भी इसी प्राचीन ज्ञान की धारा का हिस्सा हैं।
भारत में मैगनेटिज्म का मूल अथर्ववेद में मिलता है। ऋषियों ने हजारों साल पहले यह खोज लिया था कि मानव शरीर से एक अदृश्य ऊर्जा निकलती है जिसे 'प्राण' कहते हैं।
स्पर्श चिकित्सा (Sparsha Chikitsa): प्राचीन वैद्य और योगी अपने हाथों से रोगी के ऊर्जा क्षेत्र (Aura) को साफ करते थे। इसे ही आज पश्चिम में 'Reiki' या 'Pranic Healing' के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसकी जड़ें भारत में हैं।
आधुनिक इतिहास में, भारत मैगनेटिज्म का केंद्र रहा है। 1840 के दशक में, स्कॉटिश सर्जन डॉ. जेम्स एस्डाेल ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक अस्पताल चलाया।
भारतीय योग शास्त्र के अनुसार, हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ (Energy Channels) हैं। जब हम ध्यान और प्राणायाम करते हैं, तो हमारे शरीर में 'ओजस' (Ojas) और 'तेजस' (Tejas - Radiance/Magnetism) बढ़ता है। यही तेजस चुंबकत्व है जो दूसरों को आकर्षित करता है।
आज का विज्ञान अब उन तथ्यों को स्वीकार कर रहा है जो ऋषियों को हजारों साल पहले पता थे। मैगनेटिज्म कोई जादू नहीं, बल्कि एक 'बायो-फिजिक्स' (Bio-physics) की प्रक्रिया है।
नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट ओ. बेकर और फ्रिट्ज-अल्बर्ट पॉप ने सिद्ध किया है कि मानव शरीर एक 'लिक्विड क्रिस्टल' की तरह है। हमारी हर कोशिका से प्रकाश के अत्यंत सूक्ष्म कण निकलते हैं जिन्हें 'बायोफोटॉन्स' (Biophotons) कहते हैं। जब एक हीलर अपने हाथ पास लाता है, तो वह वास्तव में इन फोटॉन्स और विद्युत-चुंबकीय तरंगों का आदान-प्रदान कर रहा होता है।
अमेरिका के हार्टमैथ संस्थान ने प्रमाणित किया है कि हृदय का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) मस्तिष्क से 5000 गुना अधिक शक्तिशाली है। यह क्षेत्र शरीर से कई फीट बाहर तक फैला होता है। जब हीलर 'प्रेम' और 'करुणा' की अवस्था में होता है, तो उसका हृदय एक शक्तिशाली सिग्नल भेजता है जो रोगी के ब्रेन-वेव्स (Brain Waves) को बदल सकता है।
रूसी वैज्ञानिक सेम्योन किर्लियन ने एक कैमरा विकसित किया जो शरीर के चारों ओर के ऊर्जा क्षेत्र (Aura) की तस्वीर ले सकता है। इसे GDV (Gas Discharge Visualization) कहते हैं।
क्वांटम भौतिकी कहती है कि दो कण एक बार जुड़ने के बाद, चाहे कितनी भी दूर क्यों न हों, एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह 'डिस्टेंस हीलिंग' (Distance Healing) का वैज्ञानिक आधार है।
उपचार (Healing) केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं है, यह ऊर्जा के संतुलन की कला है।
हर जीवित प्राणी के पास एक बायो-मैग्नेटिक फील्ड होता है। जब यह फील्ड कमजोर होता है, तो व्यक्ति बीमार पड़ता है। एक मैगनेटिस्ट (Magnetist) अपनी अतिरिक्त ऊर्जा (Surplus Prana) का उपयोग करके रोगी को 'चार्ज' करता है।
मैगनेटिज्म विकसित करने के लिए शरीर और मन का शुद्ध होना आवश्यक है। इसे भारतीय परंपरा में 'तपस्या' और जावानीस में 'लाकू' कहते हैं।
1. मुतिह (Mutih - सात्विक उपवास):
केवल सादा चावल और पानी। नमक और मसालों का त्याग। यह शरीर से 'राजसिक' और 'तामसिक' तत्वों को बाहर निकालता है, जिससे प्राण का प्रवाह बिना रुकावट के होता है।
2. नगेबलेंग (Ngebleng - मौन और एकांत):
बाहरी दुनिया से संपर्क तोड़ना। एक अंधेरे कमरे में ध्यान करना। यह ऋषि-मुनियों की गुफा तपस्या के समान है। इससे इंद्रियाँ (Senses) अंतर्मुखी हो जाती हैं।
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, वीर्य (Vital Fluid) ही ओजस में बदलता है। मैगनेटिज्म के लिए ब्रह्मचर्य का पालन या संयम अत्यंत आवश्यक है। संरक्षित ऊर्जा ही आंखों और हाथों से चुंबकीय शक्ति बनकर निकलती है।
सफलता के लिए किसी जादू की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति (Willpower) और प्राण (Prana) की आवश्यकता होती है।
प्राचीन विज्ञान कहता है: "यथा दृष्टि तथा सृष्टि"।
जब आप अपनी मानसिक ऊर्जा को एक ही विचार पर केंद्रित करते हैं, तो वह विचार चुंबकीय हो जाता है। यह लोगों, अवसरों और धन को आपकी ओर खींचता है। इसे 'आकर्षण शक्ति' (Akarshana Shakti) कहते हैं।
मैगनेटिज्म का उपयोग वस्तुओं (जैसे तेल, अंगूठी, या पानी) को चार्ज करने के लिए किया जा सकता है।
विधि:
अपने हाथों को रगड़कर गर्म करें। वस्तु को हाथों के बीच रखें। गहरी सांस लें और कल्पना करें कि सुनहरी रोशनी (Golden Light) आपके हाथों से निकलकर उस वस्तु में समा रही है। अपनी इच्छा (Intent) को स्पष्ट रूप से मन में दोहराएं। यह वस्तु अब एक 'ताबीज' या 'मैग्नेट' की तरह काम करेगी।
प्राचीन युद्धकला (Martial Arts) और योग में शरीर को कठोर और अभेद्य बनाने की विधियां थीं। यह केवल मांसपेशियों की ताकत नहीं, बल्कि 'प्राण कवच' है।
सिद्धांत: जब हम कुंभक (Breath Retention) के साथ शरीर के हर सेल में प्राण भरते हैं, तो शरीर लोहे जैसा मजबूत महसूस होता है। यह जावानीस "Bandung Karosan" और भारतीय "वज्र अंग" का विज्ञान है।
नकारात्मक ऊर्जा या बुरी नजर से बचने के लिए 'आभामंडल' (Aura) को मजबूत करना जरूरी है।
तकनीक:
प्रतिदिन ध्यान करें कि एक सफेद या नीले रंग की आग (Divine Fire) आपके चारों ओर जल रही है। यह आग किसी भी नकारात्मकता को जला देती है। इसे भारतीय परंपरा में 'कवच' (Kavacha) कहा जाता है। किसी बाहरी मंत्र की आवश्यकता नहीं है, आपका संकल्प (Sankalpa) ही सबसे बड़ा मंत्र है।
अपने अभ्यास को रिकॉर्ड करें। यह 'मैगनेटिज्म' विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण है।